Trust In God

In everything that you do, do your best and leave the rest to god 
Everything is written by him.He is All knowing.
when you have faith, no wind can blow you off your track,
no storm can sink your ship without his permission.
Keep on sailing and faith. God willing, everything will be all right.

मां दुर्गा की कहानी

या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

कैलाश पर्वत के ध्यानी की अर्धांगिनी मां सती पार्वती को ही शैलपुत्री‍, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री आदि नामों से जाना जाता है। इसके अलावा भी मां के अनेक नाम हैं जैसे दुर्गा, जगदम्बा, अम्बे, शेरांवाली आदि, लेकिन सबमें सुंदर नाम तो 'मां' ही है। 

माता की कथा :
आदि सतयुग के राजा दक्ष की पुत्री पार्वती माता को शक्ति कहा जाता है। यह शक्ति शब्द बिगड़कर 'सती' हो गया। पार्वती नाम इसलिए पड़ा की वह पर्वतराज अर्थात् पर्वतों के राजा की पुत्र थी। राजकुमारी थी। लेकिन वह भस्म रमाने वाले योगी शिव के प्रेम में पड़ गई। शिव के कारण ही उनका नाम शक्ति हो गया। पिता की ‍अनिच्छा से उन्होंने हिमालय के इलाके में ही रहने वाले योगी शिव से विवाह कर लिया।

एक यज्ञ में जब दक्ष ने पार्वती (शक्ति) और शिव को न्यौता नहीं दिया, फिर भी पार्वती शिव के मना करने के बावजूद अपने पिता के यज्ञ में पहुंच गई, लेकिन दक्ष ने शिव के विषय में सती के सामने ही अपमानजनक बातें कही। पार्वती को यह सब बरदाश्त नहीं हुआ और वहीं यज्ञ कुंड में कूद कर अपने प्राण त्याग दिए।

यह खबर सुनते ही शिव ने अपने सेनापति वीरभद्र को भेजा, जिसने दक्ष का सिर काट दिया। इसके बाद दुखी होकर सती के शरीर को अपने सिर पर धारण कर शिव ‍क्रोधित हो धरती पर घूमते रहे। इस दौरान जहां-जहां सती के शरीर के अंग या आभूषण गिरे वहां बाद में शक्तिपीठ निर्मित किए गए। जहां पर जो अंग या आभूषण गिरा उस शक्तिपीठ का नाम वह हो गया। इसका यह मतलब नहीं कि अनेक माताएं हो गई।

माता पर्वती ने ही ‍शुंभ-निशुंभ, महिषासुर आदि राक्षसों का वध किया था।

माता का रूप
मां के एक हाथ में तलवार और दूसरे में कमल का फूल है। पितांबर वस्त्र, सिर पर मुकुट, मस्तक पर श्वेत रंग का अर्थचंद्र तिलक और गले में मणियों-मोतियों का हार हैं। शेर हमेशा माता के साथ रहता है।

माता की प्रार्थना
जो दिल से पुकार निकले वही प्रार्थना। न मंत्र, न तंत्र और न ही पूजा-पाठ। प्रार्थना ही सत्य है। मां की प्रार्थना या स्तुति के पुराणों में कई श्लोक दिए गए है।

माता का तीर्थ
शिव का धाम कैलाश पर्वत है वहीं मानसरोवर के समीप माता का धाम है। जहां दक्षायनी माता का मंदिर बना है। वहीं पर मां साक्षात विराजमान है।

श्रीकृष्ण के भक्त के साथ ऐसा कर काल से ना बच पाए

एक सेठजी कपड़े की दुकान करते थे. खाली समय में वे 'गीता' पढ़ने बैठ जाते. सत्संग का काफी अच्छा प्रभाव जो था. श्री कृष्ण के भी पक्के भक्त थे.
एक दिन दुकान पर दो किसान आये. उन्होंने कुछ कपड़े ख़रीदे और बाद में पैसे चुकाने की कह कर चले गए. सेठजी भी भले आदमी थे. 4-5 महीने हो गए तो सेठजी ने उनसे तगादा किया. फिर भी उन्होंने पैसे नही दिए तो उन्होंने ब्याज सहित 7 हज़ार रूपए बता दिए.
उन दोनों का माथा घूम गया और 4 महीने बाद फसल काट कर पैसे देने की बात कही. उन लोगों ने सोचा की सेठ को मरवा देते हैं. दोनों एक तांत्रिक के पास गए जो मारण-मन्त्र से किसी को भी मारने का दावा करता था.

दोनों ने उसे 1000 में से 500 रूपए एडवांस में दे दिए. सोचा 6000 तो बचेंगे ! उन दोनों ने यह भी कह दिया कि 3-4 महीनो में बीमार कर के खत्म करना जिससे वो परेशान भी हो, पूरा पैसा भी खर्च कर दे इलाज में, और लोगों को शक भी न हो.

अब दोनों एक हफ्ते बाद गए तो देखा सेठ भले-चंगे थे और अपने पैसे मांग रहे थे ! उन्होंने बात जाकर तांत्रिक से कही.
इधर जबसे उसने मन्त्र का आरम्भ किया था, उसका खुद का लड़का बीमार रहने लगा. उसने अपने गुरूजी से जाकर पूछा कि ऐसा क्यूँ हो रहा है ! गुरूजी ने बताया कि सेठजी रोज 'गीता' पढ़ते हैं, इसीलिए श्रीकृष्ण की उन पर विशेष कृपा है. इसी कारण मन्त्र के विपरीत प्रभाव से तुम्हारे लड़के को बीमारी लग गयी है. सेठजी से जाकर क्षमा मांगो, तभी तुम्हारा लड़का बच पायेगा !

वो तांत्रिक भगा भगा गया; सेठजी का पता पूछते हुए उनके पास आया, और आते ही उनके चरणों में गिर पड़ा और क्षमा मांगने लगा. सेठजी ने कहा- 'भाई ! मैं तो तुम्हें जानता भी नहीं, फिर किस बात कि क्षमा मांग रहे हो?' उस तांत्रिक ने पूरी बात बताई. तो सेठजी की प्रभु की साक्षात् कृपा देख कर आँखें भर आयीं और उन्होंने कहा- 'देखो आगे से किसी के साथ ऐसा मत करना. मैं प्रभु से तुम्हारे किये प्रार्थना करूँगा.' ये सुन वो तांत्रिक आभार मान चला गया.

इधर वो कपटी किसान श्रीकृष्ण के भक्त के साथ ऐसा कर काल से ना बच पाए. कुछ दिन बाद ही उनकी मृत्यु हो गयी.
ये बात पूरे गाँव में फ़ैल गयी, और बस में जाते समय उसी गाँव के किसी ने ये घटना सुनाई थी, जो 'कल्याण' में प्रकाशित हुई थी.

श्री कृष्णः शरणम् ममः ll श्री कृष्णः शरणम् ममः ll श्री कृष्णः शरणम् ममः ll श्री कृष्णः शरणम् ममः ll